Monday, August 13, 2007

आजादी पर विशेष...............

"कैसी ये आजादी"

६० वर्ष बीत गये आजादी के
हक छीन गये क्रांतिकारी के!

खुलेआम हो रहा है कत्लेआम
फ़िर भी चुपचाप है ये आवाम!!



हिंसा ने अहिंसा को रौंध डाला
भाई-भाई को दुश्मन कर डाला!

कल्युग ने सत्युग पर विजय पाया
कैसी थी ये फ़िरंगियो की माया!!



बंट गयी सीमाएं सारी
सिमट गयीं बाहें हमारी!

बैरी बन बैठे हम अपनो के
टूट गयी दूनिया सपनो के!!




गयी मधूरता वाणी से
धूली वीरता पानी से!

लहू का रंग काला स्याही हुआ
मान-सम्मान का व्यापारी हुआ!!




नमन है सभी देशभक्तो को
जिंहोने दिया अपना बलिदान!

रखा भारत माता का मान
हे!!वीर तुझे कोटि-कोटि प्रणाम!!

*******प्रेषक:- कवि "राज" (रणधीर कुमार)*********

"अनजान पथिक"

"अनजान पथिक"


गुमनाम हू मै , गुमनामी की राह चले जा रहा हूं
अनजान पथिक की तरह गुमराह हुए जा रहा हूं
बिछर गया कार्वां से, अकेला बढे जा रहा हूं!

पथ निहारते नयन , अरसा बीत गया
कोइ राही नही मिला, तनहा मैं रह गया
रुका नही पथ पर मै, बढे जा रहा हुं!!

कोई साथी नही, कोइ राही नहीं कोइ अपना नहीं
कोई सपना नही , कोइ हर्श नही कोइ उल्लास नहीं
कोई शिकायत नही,कोइ गिला-शिकवा भी नही!!!

बस बढे जा रहा हू मनजील की तलाश मे
हौसला बुलंद है मन मे एक उमंग है
चाल मे वेग है , आखों मे तेज है!!!!

सुनी सी डगर है, अनजान से हैं रासते
बढे जा रहा हु दुनिया के वास्ते
कहते है लोग मुझे अनजान पथिक !!!!!



यह मेरी पहली रचना है उम्मीद है आपको पसंद आयेगी..........

********प्रेषक:- कवि "राज" (रणधीर कुमार) *************