"कैसी ये आजादी"
६० वर्ष बीत गये आजादी के
हक छीन गये क्रांतिकारी के!
६० वर्ष बीत गये आजादी के
हक छीन गये क्रांतिकारी के!
खुलेआम हो रहा है कत्लेआम
फ़िर भी चुपचाप है ये आवाम!!
हिंसा ने अहिंसा को रौंध डाला
भाई-भाई को दुश्मन कर डाला!
कल्युग ने सत्युग पर विजय पाया
कैसी थी ये फ़िरंगियो की माया!!
बंट गयी सीमाएं सारी
सिमट गयीं बाहें हमारी!
बैरी बन बैठे हम अपनो के
टूट गयी दूनिया सपनो के!!
गयी मधूरता वाणी से
धूली वीरता पानी से!
लहू का रंग काला स्याही हुआ
मान-सम्मान का व्यापारी हुआ!!
नमन है सभी देशभक्तो को
जिंहोने दिया अपना बलिदान!
रखा भारत माता का मान
हे!!वीर तुझे कोटि-कोटि प्रणाम!!
*******प्रेषक:- कवि "राज" (रणधीर कुमार)*********
