Monday, October 8, 2007

"मायने ज़िन्दगी के"


"जिन्दगी"

ज़िन्दगी के मायने नहीं रोटी के जंद टुकरों या पनी की दो घुंटो में
कागज़ की पत्तियो में या इंट की चार दीवरों में
आवाम कि ललकारों में या घूंघरू की झनकारों में
ज़ाम के प्यालों में या किसी के ख्यालों में!


वर्षों बीत गये गुम हुं कहीं
ज़िन्दगी से कुछ और पल
उधार लिये जा रहा हूं
घूंट अस्कों के पिये जा रहा हूं!!


कम नहीं थे पल ज़िन्दगी के
यूं हीं हर लम्हा बीत गया
मै बीच मझदार में रह गया
कोई किनारा नसीब ना हुआ!!!


एहसास हो रहा है अनभिज्ञता का
अंत:ध्वनि गुम गयी है कहीं
अंतर्रात्मा खीझ गया
भटक रहा है मुझसे दूर कहीं!!!


शैलाब उमर रहा है मन में
अंधकार है जीवन में
बंद हैं सारे रास्ते
अब तू ही बता ऎ वक्तआखिर है क्या यह ज़िन्दगी?

*******प्रेषक:- "राज" (रणधीर कुमार)*********